कमजोर मानसून से रबी फसलों की तैयारी पर भी असर का खतरा
मानसून के अंतिम हिस्से में कमजोर बारिश रबी फसलों की तैयारी के लिए भी चिंता पैदा कर सकती है। रबी की बुवाई आम तौर पर मानसून लौटने के बाद शुरू होती है और गेहूं, सरसों, चना जैसी फसलों के लिए मिट्टी में बची नमी तथा जलाशयों का स्तर महत्वपूर्ण होता है। यदि सितंबर में पर्याप्त बारिश नहीं होती तो सिंचाई पर निर्भरता बढ़ सकती है।
खरीफ और रबी को अलग-अलग मौसम मानना आसान है, लेकिन दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं। मानसून के दौरान बांध, तालाब और भूजल पुनर्भरण होता है। यही पानी सर्दियों की फसल के दौरान इस्तेमाल किया जाता है। जिन राज्यों में नहर और ट्यूबवेल नेटवर्क मजबूत है वहां असर सीमित हो सकता है, लेकिन वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में किसान बुवाई का समय या फसल का चुनाव बदल सकते हैं।
गेहूं भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पिछले वर्षों में तापमान और मौसम के उतार-चढ़ाव ने उत्पादन अनुमान को प्रभावित किया है। इसलिए सरकार बुवाई क्षेत्र, बीज उपलब्धता, उर्वरक और जलाशय स्तर पर नजर रखती है। यदि शुरुआती परिस्थितियां कमजोर हों तो किसान कम पानी वाली फसल की ओर भी जा सकते हैं।
कम बारिश का असर लागत पर भी पड़ सकता है। अधिक पंपिंग की जरूरत होने पर बिजली या डीजल खर्च बढ़ता है। छोटे किसानों के लिए यह अतिरिक्त बोझ महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर समय पर सिंचाई और उपयुक्त बीज से कई क्षेत्रों में बारिश की कमी की भरपाई संभव होती है।
अगले कुछ सप्ताह निर्णायक होंगे। मानसून की वापसी, जलाशयों की स्थिति और अक्टूबर-नवंबर का तापमान रबी सीजन की वास्तविक तस्वीर तय करेंगे। अभी जोखिम को उत्पादन नुकसान मान लेना सही नहीं होगा, लेकिन नीति निर्माताओं और किसानों के लिए तैयारी जरूरी है। बेहतर जल प्रबंधन और स्थानीय मौसम सूचना ऐसे वर्षों में कृषि जोखिम कम करने के सबसे व्यावहारिक साधन हैं। यही तैयारी आगे भी महत्वपूर्ण रहेगी।