दिल्ली में बारिश के बाद जलभराव और सड़क मरम्मत फिर चर्चा में
दिल्ली में बारिश के बाद जलभराव और क्षतिग्रस्त सड़कों का मुद्दा एक बार फिर नागरिक सुविधाओं की बहस के केंद्र में है। कुछ घंटों की तेज बारिश कई इलाकों में यातायात धीमा कर सकती है और जहां सड़क पहले से कमजोर हो वहां पानी भरने के बाद गड्ढे तेजी से बढ़ते हैं। समस्या केवल असुविधा नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा और सार्वजनिक धन के उपयोग से भी जुड़ी है।
जलभराव के पीछे कई कारण होते हैं। नालियों में कचरा, कम क्षमता वाला ड्रेनेज, निर्माण के दौरान प्राकृतिक जल प्रवाह में बदलाव और सड़क की गलत ढलान पानी निकलने में बाधा बन सकती है। दिल्ली में अलग-अलग सड़कों और नालियों की जिम्मेदारी कई एजेंसियों के पास होने से समन्वय भी चुनौती बनता है। एक विभाग सड़क सुधारता है तो दूसरे की पाइपलाइन खुदाई कुछ महीनों बाद उसे फिर नुकसान पहुंचा सकती है।
गड्ढे मानसून में अधिक खतरनाक होते हैं क्योंकि पानी भरने पर चालक उनकी गहराई नहीं देख पाते। दोपहिया वाहन सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं। बार-बार अस्थायी पैच लगाने के बजाय सड़क की बेस लेयर, ड्रेनेज और निर्माण गुणवत्ता की जांच जरूरी है। यदि मूल कारण पानी का जमाव है तो केवल ऊपर से डामर डालना स्थायी समाधान नहीं होगा।
नागरिकों के लिए शिकायत व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। फोटो और स्थान के साथ डिजिटल शिकायत दर्ज करने की सुविधा तभी उपयोगी है जब एजेंसी कार्रवाई की समयसीमा और स्थिति सार्वजनिक करे। इससे जवाबदेही बढ़ सकती है और बार-बार खराब होने वाले स्थानों की पहचान भी आसान होती है।
दिल्ली को हर मानसून में एक ही समस्या दोहराने से बचने के लिए प्री-मॉनसून सफाई, सड़क गुणवत्ता ऑडिट और एजेंसियों के साझा डेटा की जरूरत है। बारिश को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके बाद शहर कितनी जल्दी सामान्य होता है यह प्रशासनिक तैयारी का पैमाना है। जलभराव और सड़क मरम्मत को अलग-अलग समस्या मानने के बजाय एक ही शहरी जल प्रबंधन प्रणाली का हिस्सा समझना अधिक प्रभावी होगा।