UP में Nishad वोट पर बढ़ी राजनीतिक होड़
उत्तर प्रदेश में निषाद समुदाय के वोट को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और नदी किनारे के कई क्षेत्रों में निषाद, मल्लाह, केवट और संबंधित समुदाय चुनावी गणित में प्रभावशाली माने जाते हैं। किसी सीट पर इनकी संख्या अकेले परिणाम तय न भी करे, तो अन्य पिछड़ा वर्ग और स्थानीय जातीय समीकरण के साथ इनका समर्थन निर्णायक हो सकता है।
पिछले चुनावों में प्रमुख दलों ने इस समुदाय तक पहुंचने के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपनाई हैं। गठबंधन, छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ समझौते, आरक्षण और आजीविका से जुड़े वादे इस राजनीति का हिस्सा रहे हैं। निषाद समुदाय की मांगें केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं हैं। मत्स्य पालन, नदी संसाधनों तक पहुंच, नाव चलाने वाले परिवारों की आजीविका और सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी जैसे मुद्दे स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण हैं।
भाजपा के लिए चुनौती अपने मौजूदा सामाजिक गठबंधन को बनाए रखने की है, जबकि समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल गैर-यादव OBC समूहों में अधिक जगह बनाने की कोशिश करते रहे हैं। छोटे क्षेत्रीय दल इस प्रतिस्पर्धा में अपनी सौदेबाजी क्षमता बढ़ाते हैं क्योंकि उनका प्रभाव कुछ खास जिलों में केंद्रित हो सकता है।
हालांकि किसी समुदाय को एक समान वोट बैंक मानना राजनीतिक वास्तविकता को सरल बना देता है। युवा मतदाता, रोजगार, स्थानीय उम्मीदवार, कानून व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों पर परिवारों के भीतर भी अलग राय हो सकती है। शहरीकरण और पलायन ने पारंपरिक जातीय मतदान पैटर्न को भी कई जगह बदल दिया है।
आने वाले चुनावी दौर में निषाद मतदाताओं को लेकर बयान और राजनीतिक कार्यक्रम बढ़ने की संभावना है। लेकिन दलों की असली परीक्षा यह होगी कि वे प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से आगे बढ़कर स्थानीय आर्थिक मुद्दों पर क्या ठोस प्रस्ताव देते हैं। उत्तर प्रदेश की बहुस्तरीय राजनीति में छोटे सामाजिक समूहों की भूमिका अक्सर सीट-दर-सीट बदलती है, इसलिए उम्मीदवार चयन और स्थानीय गठबंधन राज्यव्यापी नारों जितने ही महत्वपूर्ण रहेंगे।