BRICS मंच पर भारत की कूटनीतिक भूमिका और मजबूत
नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन ने भारत को एक बार फिर ऐसी कूटनीतिक भूमिका में रखा है जहां उसे अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक हितों वाले देशों के बीच साझा एजेंडा बनाने की कोशिश करनी है। समूह के विस्तार के बाद इसकी विविधता बढ़ी है। चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और भारत के साथ नए सदस्य वैश्विक शासन, व्यापार और सुरक्षा पर हमेशा एक जैसी प्राथमिकताएं नहीं रखते।
भारत के लिए BRICS का महत्व इस बात में है कि यह पश्चिमी संस्थानों के बाहर बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ संवाद का मंच देता है, जबकि नई दिल्ली अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ भी करीबी संबंध बनाए रखती है। यह बहु-संरेखण भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषता बन चुका है। भारत किसी एक ब्लॉक में बंधने के बजाय अलग मुद्दों पर अलग साझेदारों के साथ काम करना चाहता है।
सम्मेलन में पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक व्यापार, AI, वित्तीय सहयोग और विकास संस्थानों की भूमिका जैसे विषय महत्वपूर्ण रहे। भारत की कोशिश रही कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद आर्थिक और विकास एजेंडा आगे बढ़े। ग्लोबल साउथ की आवाज और बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार का मुद्दा भी नई दिल्ली के लिए लगातार महत्वपूर्ण रहा है।
चीन के साथ संबंध इस मंच को और महत्वपूर्ण बनाते हैं। सीमा तनाव के बाद दोनों देशों ने रिश्तों को स्थिर करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और व्यापार असंतुलन बने हुए हैं। BRICS जैसे मंच नेताओं को द्विपक्षीय तनाव से अलग व्यापक मुद्दों पर संवाद का अवसर देते हैं।
भारत की कूटनीतिक सफलता का आकलन केवल संयुक्त घोषणा से नहीं होगा। असली सवाल यह है कि क्या सम्मेलन के बाद व्यापार, तकनीक, विकास वित्त और राजनीतिक संवाद में ठोस प्रगति होती है। विविध सदस्यता वाले BRICS में सहमति बनाना कठिन है, लेकिन यही भारत के लिए अवसर भी है: वह समूह को किसी एक देश के एजेंडे के बजाय व्यावहारिक सहयोग के मंच के रूप में आकार देने की कोशिश कर सकता है।