सारस्वती ताल के ग्लेशियर-लेक जोखिम का सर्वे, विशेषज्ञों की टीम सक्रिय
उत्तराखंड में सारस्वती ताल से जुड़े ग्लेशियर-लेक जोखिम का आकलन करने के लिए विशेषज्ञों की टीम सर्वे कर रही है। हिमालय में ग्लेशियर पीछे हटने के साथ कई स्थानों पर नई झीलें बन रही हैं या पुरानी झीलों का आकार बदल रहा है। यदि पानी को रोकने वाली प्राकृतिक बर्फ या मलबे की दीवार अचानक टूट जाए तो नीचे की घाटियों में तेज बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।
ऐसी घटनाओं को glacial lake outburst flood यानी GLOF कहा जाता है। हर ग्लेशियर झील खतरनाक नहीं होती। जोखिम झील के आकार, बांध की स्थिरता, आसपास की ढलान, हिमस्खलन की संभावना और नीचे बसे क्षेत्रों पर निर्भर करता है। इसलिए उपग्रह चित्र के साथ जमीन पर सर्वे जरूरी है।
विशेषज्ञ पानी की मात्रा, झील की गहराई, आसपास की चट्टान और संभावित निकासी मार्ग का अध्ययन कर सकते हैं। ड्रोन और रिमोट सेंसिंग से दुर्गम इलाके का डेटा मिलना आसान हुआ है। समय के साथ तस्वीरों की तुलना करके यह भी देखा जा सकता है कि झील कितनी तेजी से बढ़ रही है।
उत्तराखंड के लिए यह काम विशेष महत्व रखता है क्योंकि राज्य में जलविद्युत परियोजनाएं, सड़कें, तीर्थ मार्ग और नदी घाटियों में बसे शहर हैं। ऊंचाई पर हुई घटना का असर कई किलोमीटर नीचे तक पहुंच सकता है। शुरुआती चेतावनी प्रणाली और संभावित बाढ़ मार्ग का नक्शा आपदा प्रबंधन को प्रतिक्रिया के लिए अतिरिक्त समय दे सकता है।
सर्वे का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं बल्कि जोखिम को मापना है। वैज्ञानिक आकलन के बाद ही तय किया जा सकता है कि झील की नियमित निगरानी पर्याप्त है या पानी नियंत्रित तरीके से निकालने जैसे हस्तक्षेप की जरूरत है। हिमालय में बदलती जलवायु के दौर में ऐसे अध्ययन भविष्य की आपदा तैयारी का जरूरी हिस्सा बनते जा रहे हैं। स्थानीय प्रशासन तक सर्वे के निष्कर्ष पहुंचाना और नियमित निगरानी की जिम्मेदारी तय करना अगला महत्वपूर्ण कदम होगा।