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Greater BRICS के लिए AI और सेवा व्यापार सहयोग का प्रस्ताव

EditorSeptember 13, 20269:06 am

नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने समूह के विस्तारित स्वरूप को अधिक व्यावहारिक आर्थिक मंच बनाने के लिए कई नए प्रस्ताव रखे। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में ओपन-सोर्स सहयोग, विशेष आर्थिक क्षेत्रों के बीच साझेदारी और सेवा व्यापार को बढ़ाने के लिए एक नए मंच की योजना शामिल है। इन प्रस्तावों का मकसद BRICS को केवल राजनीतिक संवाद के मंच से आगे ले जाकर तकनीक, निवेश और व्यापार में ठोस सहयोग की दिशा में बढ़ाना है।

BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के समूह के रूप में हुई थी और बाद में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ। पिछले कुछ वर्षों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया के जुड़ने से इसका दायरा काफी बढ़ा है। अब समूह दुनिया की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। विस्तार के साथ इसकी राजनीतिक ताकत बढ़ी है, लेकिन सदस्य देशों की अलग-अलग प्राथमिकताओं के कारण सहमति बनाना पहले से कठिन भी हुआ है।

शी ने इसी विस्तारित समूह को ‘Greater BRICS’ के रूप में अधिक संगठित आर्थिक सहयोग की दिशा में ले जाने की बात की। चीन ने BRICS AI Open Source Zone बनाने का प्रस्ताव रखा है, जिसका उद्देश्य बड़े भाषा मॉडल, AI प्रशिक्षण और खुले तकनीकी इकोसिस्टम पर सहयोग बढ़ाना होगा। यदि यह योजना आगे बढ़ती है तो भारत सहित सदस्य देशों की कंपनियों और शोध संस्थानों के लिए साझा तकनीकी परियोजनाओं और मानकों पर काम करने के नए अवसर बन सकते हैं।

दूसरा प्रस्ताव BRICS Special Economic Zone Partnership का है। इसके जरिए अलग-अलग सदस्य देशों के औद्योगिक और विशेष आर्थिक क्षेत्रों को निवेश, सप्लाई चेन और उत्पादन नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश की जा सकती है। चीन ने अगले वर्ष BRICS Service Trade Forum आयोजित करने की भी पेशकश की है। भारत के लिए सेवा व्यापार विशेष महत्व रखता है क्योंकि आईटी, वित्तीय सेवाएं, डिजिटल प्लेटफॉर्म और पेशेवर सेवाएं उसकी वैश्विक आर्थिक ताकत का अहम हिस्सा हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन में कहा कि BRICS के भीतर विकसित समाधान केवल सदस्य देशों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उन्हें व्यापक Global South की जरूरतों के अनुरूप उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यह भारत की उस नीति से मेल खाता है जिसमें डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, भुगतान तकनीक और विकास समाधानों को अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझा करने पर जोर दिया जाता है।

हालांकि प्रस्तावों को जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा। BRICS के सदस्य देशों के आर्थिक मॉडल, सुरक्षा हित और पश्चिमी देशों के साथ संबंध अलग-अलग हैं। भुगतान व्यवस्था, डेटा, AI मानक और निवेश जैसे क्षेत्रों में साझा नियम बनाना समय ले सकता है। इसलिए नई दिल्ली से निकले प्रस्तावों का असली महत्व इस बात से तय होगा कि अगले एक-दो वर्षों में कितनी योजनाएं संस्थागत रूप लेती हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि BRICS की अगली प्रतिस्पर्धा केवल भू-राजनीतिक बयानबाजी की नहीं, बल्कि तकनीक और आर्थिक सहयोग में ठोस परिणाम देने की होगी।

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