BRICS ने नई दिल्ली घोषणा अपनाई, पश्चिम एशिया में संयम की अपील
नई दिल्ली में हुए BRICS शिखर सम्मेलन ने ऐसे समय में साझा घोषणा को मंजूरी दी है जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा हुआ है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भू-राजनीतिक जोखिमों का दबाव बना हुआ है। सदस्य देशों ने नई दिल्ली घोषणा में क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर गंभीर चिंता जताई और सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने की अपील की। भारत के लिए यह सहमति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विस्तारित BRICS में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश एक ही मंच पर मौजूद हैं और दोनों की क्षेत्रीय प्राथमिकताएं कई मामलों में अलग रही हैं।
घोषणा का मुख्य संदेश बातचीत, परामर्श और कूटनीति के जरिए विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर जोर देना है। इसके साथ ही सदस्य देशों ने व्यापार को प्रभावित करने वाले एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों पर भी चिंता जताई। सम्मेलन की चर्चा केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रही। व्यापार, निवेश, डिजिटल ढांचा, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जलवायु सहयोग भी एजेंडे के प्रमुख हिस्से रहे। विस्तारित समूह की विविधता को देखते हुए इन मुद्दों पर साझा भाषा तैयार करना अपने आप में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अभ्यास था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन के दूसरे दिन कहा कि दुनिया में बढ़ते संघर्ष, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और जलवायु संकट का असर आम लोगों पर पड़ रहा है। उन्होंने तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों के रणनीतिक इस्तेमाल से पैदा होने वाले जोखिमों का भी उल्लेख किया। भारत ने BRICS के भीतर स्वास्थ्य, स्टार्टअप, कृषि, ऊर्जा भंडारण और आपूर्ति शृंखला से जुड़े सहयोग को आगे बढ़ाने की बात रखी है। इस दिशा में संक्रामक बीमारियों के लिए एकीकृत शुरुआती चेतावनी व्यवस्था और स्टार्टअप सहयोग जैसे प्रस्ताव भी सामने आए हैं।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आर्थिक और तकनीकी सहयोग को गहरा करने के लिए ‘Greater BRICS’ की अवधारणा पर जोर दिया। चीन ने AI ओपन-सोर्स सहयोग, विशेष आर्थिक क्षेत्रों की साझेदारी और सेवा व्यापार मंच जैसे प्रस्ताव रखे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने समूह को अधिक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण मंच बताया। इन प्रस्तावों से यह संकेत मिलता है कि BRICS खुद को केवल राजनीतिक संवाद के मंच के बजाय व्यावहारिक आर्थिक और तकनीकी सहयोग के नेटवर्क के रूप में पेश करना चाहता है।
फिर भी समूह के सामने चुनौती कम नहीं है। सदस्य देशों के अमेरिका, चीन, रूस और पश्चिम एशिया के साथ रिश्ते अलग-अलग हैं। आर्थिक हित, सुरक्षा चिंताएं और विदेश नीति की प्राथमिकताएं भी समान नहीं हैं। ऐसे में नई दिल्ली घोषणा की अहमियत किसी एक बड़े फैसले से ज्यादा इस बात में है कि इतने विविध देशों ने तनावपूर्ण वैश्विक माहौल में साझा भाषा पर सहमति बनाई। आने वाले महीनों में असली परीक्षा यह होगी कि व्यापार, भुगतान, तकनीक, स्वास्थ्य और जलवायु से जुड़े प्रस्ताव कितनी तेजी से जमीन पर उतरते हैं। भारत की 2026 की अध्यक्षता के लिए भी यही पैमाना तय करेगा कि नई दिल्ली सम्मेलन को केवल कूटनीतिक आयोजन के रूप में याद किया जाएगा या ठोस सहयोग की दिशा में एक उपयोगी मोड़ के रूप में।