मंडी में विकास कार्यों की रफ्तार पर सांसद और अधिकारियों में टकराव
मंडी में विकास परियोजनाओं की रफ्तार को लेकर सांसद और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच सामने आया मतभेद स्थानीय शासन में जवाबदेही और समन्वय की चुनौती को रेखांकित करता है। सड़क, पेयजल, भवन और अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं में देरी होने पर जनप्रतिनिधियों पर मतदाताओं का दबाव बढ़ता है, जबकि अधिकारी तकनीकी मंजूरी, बजट और ठेके की प्रक्रियाओं का हवाला देते हैं।
किसी जिले में बड़ी संख्या में परियोजनाएं एक साथ चलने पर उनकी निगरानी के लिए स्पष्ट समयसीमा जरूरी होती है। केवल स्वीकृति या शिलान्यास से काम पूरा नहीं होता। भूमि उपलब्धता, वन मंजूरी, डिजाइन में बदलाव और मौसम जैसी वजहें पहाड़ी जिलों में निर्माण को प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन लंबे समय तक प्रगति न होने पर विभागों को कारण और संशोधित समयसीमा सार्वजनिक करनी चाहिए।
मंडी जैसे पहाड़ी जिले में मानसून निर्माण कार्यों के लिए अतिरिक्त चुनौती पैदा करता है। भूस्खलन और सड़क बंद होने से सामग्री पहुंचाने में देरी हो सकती है। इसके बावजूद उन परियोजनाओं को प्राथमिकता देना जरूरी है जिनका संबंध अस्पताल, स्कूल, पेयजल या प्रमुख संपर्क मार्गों से है। बजट का समय पर उपयोग न होने से अगले वित्तीय वर्ष की योजना भी प्रभावित हो सकती है।
जनप्रतिनिधि और अधिकारी यदि सार्वजनिक मंच पर केवल आरोप-प्रत्यारोप करें तो परियोजना की वास्तविक समस्या पीछे छूट सकती है। बेहतर व्यवस्था यह होगी कि हर बड़ी योजना के लिए जिम्मेदार विभाग, वर्तमान प्रगति, बाधा और नई समयसीमा की साझा सूची तैयार की जाए। इससे नागरिक भी देख सकेंगे कि देरी किस स्तर पर है।
स्थानीय विकास में राजनीतिक निगरानी और प्रशासनिक विशेषज्ञता दोनों की भूमिका है। टकराव तभी उपयोगी परिणाम दे सकता है जब उसके बाद निर्णय और काम की गति सुधरे। मंडी में अब नजर इस बात पर रहेगी कि समीक्षा बैठकों के बाद अटकी परियोजनाओं पर वास्तविक प्रगति होती है या विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाता है।