हिमाचल में मानसून के बाद सड़क और ढलान सुरक्षा पर बढ़ी निगरानी
हिमाचल प्रदेश में मानसून के बाद सड़कों, पुलों और पहाड़ी ढलानों की सुरक्षा पर निगरानी बढ़ाई जा रही है। लगातार बारिश के महीनों में मिट्टी कमजोर होने, चट्टानें खिसकने और जल निकासी बाधित होने से कई मार्गों पर नुकसान होता है। बारिश थमने के बाद भी जोखिम तुरंत खत्म नहीं होता, क्योंकि पानी से संतृप्त ढलान कई दिनों या हफ्तों बाद भी खिसक सकते हैं।
लोक निर्माण विभाग और जिला प्रशासन के लिए प्राथमिकता उन स्थानों की पहचान करना है जहां पहले भूस्खलन हुआ है या सड़क की दीवारों में दरारें दिखाई दी हैं। नालियों की सफाई और पानी के प्राकृतिक बहाव को बहाल करना भी जरूरी है। पहाड़ों में सड़क के ऊपर जमा पानी यदि ढलान के भीतर जाता रहे तो कमजोर हिस्से अचानक टूट सकते हैं।
पर्यटन सीजन और रोजमर्रा की स्थानीय आवाजाही के कारण प्रमुख मार्गों को लंबे समय तक बंद रखना संभव नहीं होता। इसी वजह से मरम्मत के साथ यातायात प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है। संवेदनशील हिस्सों पर संकेतक, रात की रोशनी और जरूरत पड़ने पर एकतरफा यातायात दुर्घटनाओं का जोखिम कम कर सकता है। यात्रियों को भी मौसम और सड़क की ताजा जानकारी देखकर निकलना चाहिए।
सड़क सुरक्षा का मुद्दा केवल मानसून के बाद की मरम्मत तक सीमित नहीं है। नई सड़क काटते समय ढलान स्थिरीकरण, रिटेनिंग वॉल और वैज्ञानिक ड्रेनेज पर पर्याप्त निवेश न हो तो हर बारिश में वही स्थान दोबारा क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के साथ कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ने की आशंका पहाड़ी बुनियादी ढांचे के लिए अतिरिक्त चुनौती है।
हिमाचल के लिए दीर्घकालिक समाधान नियमित भू-तकनीकी सर्वे, जोखिम वाले स्थानों की डिजिटल मैपिंग और मरम्मत बजट को रोकथाम से जोड़ना है। मानसून के बाद की मौजूदा निगरानी यदि केवल क्षति दर्ज करने के बजाय कमजोर ढलानों को पहले से मजबूत करने में बदलती है तो अगले बारिश के मौसम में सड़क बंद होने और दुर्घटनाओं दोनों को कम किया जा सकता है।