RBI की बड़ी बॉन्ड बिक्री से बैंकिंग सिस्टम की अतिरिक्त नकदी पर नजर
भारतीय रिजर्व बैंक की बड़ी बॉन्ड बिक्री ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी पर बाजार का ध्यान खींचा है। केंद्रीय बैंक जब सरकारी प्रतिभूतियां बेचता है तो खरीदारों से पैसा सिस्टम से बाहर जाता है और बैंकों के पास उपलब्ध अधिशेष तरलता घटती है। यह कदम मौद्रिक नीति की उस प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें RBI ब्याज दरों के साथ-साथ नकदी की मात्रा को भी संतुलित करता है।
अतिरिक्त नकदी लंबे समय तक बनी रहे तो अल्पकालिक बाजार दरें नीति दर से नीचे जा सकती हैं। इससे केंद्रीय बैंक के संकेतों का असर कमजोर पड़ सकता है। बॉन्ड बिक्री के जरिए RBI बाजार दरों को अपने मौद्रिक रुख के करीब रखने की कोशिश कर सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि बैंकिंग सिस्टम में धन की कमी पैदा की जा रही है। लक्ष्य आम तौर पर जरूरत से ज्यादा नकदी को नियंत्रित करना होता है।
बैंकों के लिए इसका असर उनकी दैनिक फंडिंग और सरकारी प्रतिभूतियों की मांग पर दिख सकता है। यदि तरलता तेजी से घटती है तो कॉल मनी और अन्य अल्पकालिक दरों में कुछ मजबूती आ सकती है। दूसरी ओर, पर्याप्त जमा आधार वाले बैंकों पर असर सीमित रह सकता है। बॉन्ड बाजार में निवेशक बिक्री के आकार, प्रतिभूतियों की अवधि और नीलामी में मिलने वाली मांग पर नजर रखते हैं।
यह कदम ऐसे समय महत्वपूर्ण है जब RBI को महंगाई, आर्थिक वृद्धि, रुपये की चाल और वैश्विक ब्याज दरों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। नकदी प्रबंधन केंद्रीय बैंक को नीतिगत दर बदले बिना वित्तीय परिस्थितियों को कुछ हद तक प्रभावित करने का अतिरिक्त साधन देता है।
आम ग्राहकों के लिए इसका तत्काल अर्थ जमा या कर्ज की दर में बदलाव नहीं है। लेकिन यदि तरलता की स्थिति लंबे समय तक सख्त रहती है तो बैंकों की फंडिंग लागत और आगे चलकर ऋण तथा जमा दरों पर असर पड़ सकता है। बाजार अब RBI की अगली नीलामियों और बैंकिंग सिस्टम की दैनिक तरलता के आंकड़ों को देखेगा।